जब भी लिखना कुछ चाह, सबसे पहले उसकी ही ख्याल आया....
और क्या लिखूं उस पर ?
फिर यही सवाल आया.............
लिखना जब भी चाह कागज पर...........
तो रुक गई कलम वही, जहाँ उसका नाम आया।
सोचा, करू वर्णन उसके रूप का
छा गयी अन्धेरा, चाँद को भी शर्माता पाया॥
लिखना तो आसमान पर भी चाह....
पर लिख सकूँ उसके बारे में, ये सोच आसमां को भी छोटा पाया।
कर देता वर्णन उसके यौवन का ........
पर ढल न जाए, इसलिए इस ख्याल को भी ठुकराया
लिखना तो हवा पर भी चाहा....
पर छोड़ न जाए मुझे, सोच कर दिल सिहर आया......
कर देता वर्णन उसकी मासूमियत का
पर नज़र न लग जाए, हाथ वह भी चल नहीं पाया
मिली थी वो एक अजनबी की तरह
पर उसे हर पल अपने पास पाया
No comments:
Post a Comment