ज़र्द मौसम को सूर्ख़ फूल हैं हम
हर नज़र को कहाँ क़ुबूल हैं हम
हुमसे हर शख्स रूठ जाता है
क्या करें, साहिबे - उसूल हैं हम
मसनदें हो गयीं अता जिनको
उनकी नज़रों में सिर्फ धुल हैं हम
काश ! हमसे कोई सवाल करे
किसलिये चुप हैं, क्यों मलूल हैं हम
अपनी सब ख़ामियों के साथ जिया
कोई तो है जिसे क़ुबूल हैं हम
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