मै भी प्यार करता हूँ........
डरता हूँ इस पथ पर चलने से, लोग इसे दीवानगी कहते है,
दीवाना कितना हूँ तेरा ये मत पूछ।
जितना दिल नहीं धड़कता है मेरा,
उतना नाम लेता हूँ तेरा ओ मेरे दिल की मालकिन॥
चाँद की सुन्दरता भी कम पड़ता है,
जब तुम मेरे सामने होती हो।
खिल उठता है ये मन विभोर होकर,
जब परियों की रानी तुम मुस्कुराती हो॥
तेरे आने से सावन की बदरी की आती है,
मोर भी ठुमकता है इस बदरी में।
जी करता आँख की पिपनी पर बैठा लूँ तुझे,
क्या खूब कथकली तू करती है॥
भूल जाता हूँ तुझे देखकर ये दुनिया,
एक नशा सा छ जाता है।
शमा जाती है तू मेरे दिलोंदिमाग में,
तुझ में ही सारा जहाँ नज़र आता है॥
दुनिया कह देगा शराबी,
इस बात से डरता हूँ।
दीवाना कितना हूँ तेरा ये मत पूछ,
हर पल तेरे आँखों के रस का रसपान करता हूँ॥
दर्द एसा दिया है तेरा प्यार ने,
दवा भी इसका तेरे पास है।
डूब गया हूँ मैं तेरे प्यार के सरोबर में,
तू मंजिल मेरी, मेरे ही आस - पास है॥
सीर कटा सकता हूँ तेरे लिए,
ये मेरा वादा है।
तुझे पाने के लिए जान की कुरबनी दे दूंगा,
यही मेरा नारा है॥
जब प्यार किया है तो डरना कैसा... क्योंकि कोई भी चीज़ को बिना किये समझा नहीं जा सकता...
ReplyDeleteखैर... आपकी रचना अच्छी बन पड़ी है...
वाह ! कविता में भावों का उमड़ता हुआ आवेग है. शिल्प में सुधार की गुंजाइश है और बर्तनी एवं व्याकरण (विशेषतः लिंगदोष) का निवारण जरूरी है. धन्यवाद !
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